Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi & More Language - Shiv bhajan Lyrics

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi & More Language - jatatavigalajjala pravahapavitasthale

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi & More Language - Shiv bhajan Lyrics
Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi & More Language - Shiv bhajan Lyrics


Shiv Tandav Stotram Benefits

Shiv tandav stotram lyrics in hindi was firstly written and sung by raavan. In this Post we gonna tell you benefits of chaning shiv tandav stotram and its meaning in various language.

The benefits of chanting Shiva Tandava Stothram are immense strength, power and positivity. Once you start to chant the Stotram, you can feel the positive vibes. You can chant it daily at any convenient time with utmost love, devotion and trust.


The story behind the Shiva Tandava Stothram is ::


One day King Ravana visits mount Khailash, with the thought of taking Shiva along with him to Lanka forever.

Before meeting Shiva, Ravana encounters Nandi. When Nandi comes to know of Ravana’s wish, Nandi asks him to forget about the thought.

Then Ravana challenges Nandi that, he can lift the entire Khailash mountain along with Shiva and take it to Lanka. Nandi laughs at this, amd immediately Ravana starts to lift the Khailash mountain.

King Ravana with his utmost devotion starts to chant the panchakshari mantra “ Namah Shivaaya “, and the entire Khailash mountain starts to move.

Shiva in order to curb Ravana’s arrogance, presses His toe on the ground, and Ravana’s hands get crushed under the mountain. It made Ravana yelp and yelp, and the sound was so strong that it caused an earthquake.

Lord Shiva lifted his toe, only when Ravana sang one of his famous creation, the Ravana Shiva Stotram or Shiva Tandava Stothram, and gave the name Ravana, one who can shake earth with his cry.

** Actally , few say that Ravana composed the stotram while lifting the Khailash mountain and Shiva pressed his toe, and Ravana hands get crushed. Shiva did this to relieve Ravana’s arrogance.


Few say that, Ravana composed the Stotram after his hands were under the mountain, and after hearing the Stotram Shiva pleased with him, lifted His toe and named him as Ravana **

Shiva Tandava Stotra is so beautiful. You will feel the presence of our lord, Shiva. It is used to please Lord Shiva, and to purify you. Many experiences include that, if you say the shiva tandav stotra it made them reach Shiva. They felt the presence of the lord. Now to your question, “ What are the Benefits of Chanting/Reciting the stotra?” If you recite with devotion and happiness, then people say that shiva will control over your death not Yama.


Lyrics:


Jatta[a]-Attavii-Galaj-Jala-Pravaaha-Paavita-Sthale

Gale-[A]valambya Lambitaam Bhujangga-Tungga-Maalikaam |

Ddamadd-Ddamadd-Ddamadd-Ddaman-Ninaadavadd-Ddamar-Vayam

Cakaara Canndda-Taannddavam Tanotu Nah Shivah Shivam ||1||


Meaning:


1.1: (There dances Shiva His Great Tandava) From His Huge Matted Hair like a Forest, is Pouring out and Flowing down the Sacred Water of the River Ganges, and making the Ground Holy; on that Holy Ground Shiva is dancing His Great Tandava Dance;

1.2: Supporting His Neck and Hanging down are the Lofty Serpents which are Adorning His Neck like Lofty Garlands,

1.3: His Damaru is continuously Weaving out the Sound - Damad, Damad, Damad, Damad - and filling the Air all around,

1.4: Shiva Performed such a Passionate Tandava; O my Lord Shiva, Please Extend the Auspicious Tandava Dance within our beings also.



Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi with Meaning - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥


उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,

और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,

और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,

भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।


जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।

धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥


मेरी शिव में गहरी रुचि है,

जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,

जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?

जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,

और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं। 


धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।

कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥


मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,

अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,

जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,

जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,

और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।


जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।

मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥


मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,

उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,

ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,

जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है। 


सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।

भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥


भगवान शिव हमें संपन्नता दें,

जिनका मुकुट चंद्रमा है,

जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,

जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,

जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है। 


ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥


शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,

जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,

जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,

जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं। 


करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।

धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥


मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,

जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,

उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,

वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,

सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।


नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥


भगवान शिव हमें संपन्नता दें,

वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,

जिनकी शोभा चंद्रमा है,

जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,

जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है। 


प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥


मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,

पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,

जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।

जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,

जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,

जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,

और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया। 


अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥


मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं

शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,

जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,

जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,

जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,

और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।


जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।

धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥


शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड

तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,

जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,

गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई। 


दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥


मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,

जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,

घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,

सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,

सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति? 


कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥


मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,

अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,

अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,

महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?


इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥


इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,

वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।

इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।

बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।



Shiv Tandav Stotram Lyrics in English with Meaning - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


Jatatavigalajjala pravahapavitasthale

Galeavalambya lambitam bhujangatungamalikam

Damad damad damaddama ninadavadamarvayam

Chakara chandtandavam tanotu nah shivah shivam


With his neck consecrated by the flow of water that flows from his hair,

And on his neck a snake, which is hung like a garland,

And the Damaru drum that emits the sound “Damat Damat Damat Damat”,

Lord Shiva did the auspicious dance of Tandava. May he give prosperity to all of us.


Jata kata hasambhrama bhramanilimpanirjhari

Vilolavichivalarai virajamanamurdhani

Dhagadhagadhagajjva lalalata pattapavake

Kishora chandrashekhare ratih pratikshanam mama


I have a deep interest in Shiva

Whose head is glorified by the rows of moving waves of the celestial Ganga river,

Which stir in the deep well of his hair in tangled locks.

Who has the brilliant fire burning on the surface of his forehead,

And who has the crescent moon as a jewel on his head.


Dharadharendrana ndinivilasabandhubandhura

Sphuradigantasantati pramodamanamanase

Krupakatakshadhorani nirudhadurdharapadi

Kvachidigambare manovinodametuvastuni


May my mind seek happiness in Lord Shiva,

In whose mind all the living beings of the glorious universe exist,

Who is the companion of Parvati (daughter of the mountain king),

Who controls unsurpassed adversity with his compassionate gaze, Which is all-pervading

And who wears the Heavens as his raiment.


Jata bhujan gapingala sphuratphanamaniprabha

Kadambakunkuma dravapralipta digvadhumukhe

Madandha sindhu rasphuratvagutariyamedure

Mano vinodamadbhutam bibhartu bhutabhartari


May I find wonderful pleasure in Lord Shiva, who is the advocate of all life,

With his creeping snake with its reddish brown hood and the shine of its gem on it

Spreading variegated colors on the beautiful faces of the Goddesses of the Directions,

Which is covered by a shimmering shawl made from the skin of a huge, inebriated elephant.


Sahasra lochana prabhritya sheshalekhashekhara

Prasuna dhulidhorani vidhusaranghripithabhuh

Bhujangaraja malaya nibaddhajatajutaka

Shriyai chiraya jayatam chakora bandhushekharah


May Lord Shiva give us prosperity,

Who has the Moon as a crown,

Whose hair is bound by the red snake-garland,

Whose footrest is darkened by the flow of dust from flowers

Which fall from the heads of all the gods – Indra, Vishnu and others.


Lalata chatvarajvaladhanajnjayasphulingabha

nipitapajnchasayakam namannilimpanayakam

Sudha mayukha lekhaya virajamanashekharam

Maha kapali sampade shirojatalamastunah


May we obtain the riches of the Siddhis from the tangled strands Shiva’s hair,

Who devoured the God of Love with the sparks of the fire that burns on his forehead,

Which is revered by all the heavenly leaders,

Which is beautiful with a crescent moon.


Karala bhala pattikadhagaddhagaddhagajjvala

Ddhanajnjaya hutikruta prachandapajnchasayake

Dharadharendra nandini kuchagrachitrapatraka

Prakalpanaikashilpini trilochane ratirmama


My interest is in Lord Shiva, who has three eyes,

Who offered the powerful God of Love to fire.

The terrible surface of his forehead burns with the sound “Dhagad, Dhagad …”

He is the only artist expert in tracing decorative lines

on the tips of the breasts of Parvati, the daughter of the mountain king.


navina megha mandali niruddhadurdharasphurat

Kuhu nishithinitamah prabandhabaddhakandharah

nilimpanirjhari dharastanotu krutti sindhurah

Kalanidhanabandhurah shriyam jagaddhurandharah


May Lord Shiva give us prosperity,

The one who bears the weight of this universe,

Who is enchanting with the moon,

Who has the celestial river Ganga

Whose neck is dark as midnight on a new moon night, covered in layers of clouds.


Praphulla nila pankaja prapajnchakalimchatha

Vdambi kanthakandali raruchi prabaddhakandharam

Smarachchidam purachchhidam bhavachchidam makhachchidam

Gajachchidandhakachidam tamamtakachchidam bhaje


I pray to Lord Shiva, whose neck is bound with the brightness of the temples

hanging with the glory of fully bloomed blue lotus flowers,

Which look like the blackness of the universe.

Who is the slayer of Manmatha, who destroyed the Tripura,

Who destroyed the bonds of worldly life, who destroyed the sacrifice,

Who destroyed the demon Andhaka, who is the destroyer of the elephants,

And who has overwhelmed the God of death, Yama.


Akharvagarvasarvamangala kalakadambamajnjari

Rasapravaha madhuri vijrumbhana madhuvratam

Smarantakam purantakam bhavantakam makhantakam

Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje


I pray to Lord Siva, who has bees flying all around because of the sweet

Scent of honey coming from the beautiful bouquet of auspicious Kadamba flowers,

Who is the slayer of Manmatha, who destroyed the Tripura,

Who destroyed the bonds of worldly life, who destroyed the sacrifice,

Who destroyed the demon Andhaka, who is the destroyer of the elephants,

And who has overwhelmed the God of death, Yama.


Jayatvadabhravibhrama bhramadbhujangamasafur

Dhigdhigdhi nirgamatkarala bhaal havyavat

Dhimiddhimiddhimidhva nanmrudangatungamangala

Dhvanikramapravartita prachanda tandavah shivah


Shiva, whose dance of Tandava is in tune with the series of loud

sounds of drum making the sound “Dhimid Dhimid”,

Who has fire on his great forehead, the fire that is spreading out because of the

breath of the snake, wandering in whirling motions in the glorious sky.


Drushadvichitratalpayor bhujanga mauktikasrajor

Garishtharatnaloshthayoh suhrudvipakshapakshayoh

Trushnaravindachakshushoh prajamahimahendrayoh

Sama pravartayanmanah kada sadashivam bhaje


When will I be able to worship Lord Sadashiva, the eternally auspicious God,

With equanimous vision towards people or emperors,

Towards a blade of grass and a lotus, towards friends and enemies,

Towards the most precious gem and a lump of dirt,

Toward a snake or a garland and towards the varied forms of the world?


Kada nilimpanirjhari nikujnjakotare vasanh

Vimuktadurmatih sada shirah sthamajnjalim vahanh

Vimuktalolalochano lalamabhalalagnakah

Shiveti mantramuchcharan sada sukhi bhavamyaham


When I can be happy, living in a cave near the celestial river Ganga,

Bringing my hands clasped on my head all the time,

With my impure thoughts washed away, uttering the mantra of Shiva,

Devoted to the God with a glorious forehead and with vibrant eyes?


Imam hi nityameva muktamuttamottamam stavam

Pathansmaran bruvannaro vishuddhimeti santatam

Hare gurau subhaktimashu yati nanyatha gatim

Vimohanam hi dehinam sushankarasya chintanam


Anyone who reads, remembers and recites this stotra as stated here

Is purified forever and obtains devotion in the great Guru Shiva.

For this devotion, there is no other way or refuge.

Just the mere thought of Shiva removes the delusion.



Shiv Tandav Stotram Lyrics in Gujarati  with Meaning - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ સાર્થશિવતાણ્ડવસ્તોત્રમ્ ॥


॥ શ્રીગણેશાય નમઃ ॥


જટાટવીગલજ્જલપ્રવાહપાવિતસ્થલે

ગલેવલંબ્ય લંબિતાં ભુજંગતુંગમાલિકામ્ |

ડમડ્ડમડ્ડમડ્ડમન્નિનાદવડ્ડમર્વયં

ચકાર ચંડતાંડવં તનોતુ નઃ શિવઃ શિવમ્ || 1 ||


જટાકટાહસંભ્રમભ્રમન્નિલિંપનિર્ઝરી-

-વિલોલવીચિવલ્લરીવિરાજમાનમૂર્ધનિ |

ધગદ્ધગદ્ધગજ્જ્વલલ્લલાટપટ્ટપાવકે

કિશોરચંદ્રશેખરે રતિઃ પ્રતિક્ષણં મમ || 2 ||


ધરાધરેંદ્રનંદિનીવિલાસબંધુબંધુર

સ્ફુરદ્દિગંતસંતતિપ્રમોદમાનમાનસે |

કૃપાકટાક્ષધોરણીનિરુદ્ધદુર્ધરાપદિ

ક્વચિદ્દિગંબરે મનો વિનોદમેતુ વસ્તુનિ || 3 ||


જટાભુજંગપિંગળસ્ફુરત્ફણામણિપ્રભા

કદંબકુંકુમદ્રવપ્રલિપ્તદિગ્વધૂમુખે |

મદાંધસિંધુરસ્ફુરત્ત્વગુત્તરીયમેદુરે

મનો વિનોદમદ્ભુતં બિભર્તુ ભૂતભર્તરિ || 4 ||


સહસ્રલોચનપ્રભૃત્યશેષલેખશેખર

પ્રસૂનધૂળિધોરણી વિધૂસરાંઘ્રિપીઠભૂઃ |

ભુજંગરાજમાલયા નિબદ્ધજાટજૂટક

શ્રિયૈ ચિરાય જાયતાં ચકોરબંધુશેખરઃ || 5 ||


લલાટચત્વરજ્વલદ્ધનંજયસ્ફુલિંગભા-

-નિપીતપંચસાયકં નમન્નિલિંપનાયકમ્ |

સુધામયૂખલેખયા વિરાજમાનશેખરં

મહાકપાલિસંપદેશિરોજટાલમસ્તુ નઃ || 6 ||


કરાલફાલપટ્ટિકાધગદ્ધગદ્ધગજ્જ્વલ-

દ્ધનંજયાધરીકૃતપ્રચંડપંચસાયકે |

ધરાધરેંદ્રનંદિનીકુચાગ્રચિત્રપત્રક-

-પ્રકલ્પનૈકશિલ્પિનિ ત્રિલોચને મતિર્મમ || 7 ||


નવીનમેઘમંડલી નિરુદ્ધદુર્ધરસ્ફુરત્-

કુહૂનિશીથિનીતમઃ પ્રબંધબંધુકંધરઃ |

નિલિંપનિર્ઝરીધરસ્તનોતુ કૃત્તિસિંધુરઃ

કળાનિધાનબંધુરઃ શ્રિયં જગદ્ધુરંધરઃ || 8 ||


પ્રફુલ્લનીલપંકજપ્રપંચકાલિમપ્રભા-

-વિલંબિકંઠકંદલીરુચિપ્રબદ્ધકંધરમ્ |

સ્મરચ્છિદં પુરચ્છિદં ભવચ્છિદં મખચ્છિદં

ગજચ્છિદાંધકચ્છિદં તમંતકચ્છિદં ભજે || 9 ||


અગર્વસર્વમંગળાકળાકદંબમંજરી

રસપ્રવાહમાધુરી વિજૃંભણામધુવ્રતમ્ |

સ્મરાંતકં પુરાંતકં ભવાંતકં મખાંતકં

ગજાંતકાંધકાંતકં તમંતકાંતકં ભજે || 10 ||


જયત્વદભ્રવિભ્રમભ્રમદ્ભુજંગમશ્વસ-

-દ્વિનિર્ગમત્ક્રમસ્ફુરત્કરાલફાલહવ્યવાટ્ |

ધિમિદ્ધિમિદ્ધિમિધ્વનન્મૃદંગતુંગમંગળ

ધ્વનિક્રમપ્રવર્તિત પ્રચંડતાંડવઃ શિવઃ || 11 ||


દૃષદ્વિચિત્રતલ્પયોર્ભુજંગમૌક્તિકસ્રજોર્-

-ગરિષ્ઠરત્નલોષ્ઠયોઃ સુહૃદ્વિપક્ષપક્ષયોઃ |

તૃષ્ણારવિંદચક્ષુષોઃ પ્રજામહીમહેંદ્રયોઃ

સમં પ્રવર્તયન્મનઃ કદા સદાશિવં ભજે || 12 ||


કદા નિલિંપનિર્ઝરીનિકુંજકોટરે વસન્

વિમુક્તદુર્મતિઃ સદા શિરઃસ્થમંજલિં વહન્ |

વિમુક્તલોલલોચનો લલાટફાલલગ્નકઃ

શિવેતિ મંત્રમુચ્ચરન્ સદા સુખી ભવામ્યહમ્ || 13 ||


ઇમં હિ નિત્યમેવમુક્તમુત્તમોત્તમં સ્તવં

પઠન્સ્મરન્બ્રુવન્નરો વિશુદ્ધિમેતિસંતતમ્ |

હરે ગુરૌ સુભક્તિમાશુ યાતિ નાન્યથા ગતિં

વિમોહનં હિ દેહિનાં સુશંકરસ્ય ચિંતનમ્ || 14 ||


પૂજાવસાનસમયે દશવક્ત્રગીતં યઃ

શંભુપૂજનપરં પઠતિ પ્રદોષે |

તસ્ય સ્થિરાં રથગજેંદ્રતુરંગયુક્તાં

લક્ષ્મીં સદૈવ સુમુખિં પ્રદદાતિ શંભુઃ || 15 ||



Shiv Tandav Stotram Lyrics in Kannada - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ ಸಾರ್ಥಶಿವತಾಂಡವಸ್ತೋತ್ರಮ್ ॥


॥ ಶ್ರೀಗಣೇಶಾಯ ನಮಃ ॥

ಜಟಾಟವೀಗಲಜ್ಜಲಪ್ರವಾಹಪಾವಿತಸ್ಥಲೇ

ಗಲೇವಲಂಬ್ಯ ಲಂಬಿತಾಂ ಭುಜಂಗತುಂಗಮಾಲಿಕಾಮ್ |

ಡಮಡ್ಡಮಡ್ಡಮಡ್ಡಮನ್ನಿನಾದವಡ್ಡಮರ್ವಯಂ

ಚಕಾರ ಚಂಡತಾಂಡವಂ ತನೋತು ನಃ ಶಿವಃ ಶಿವಮ್ || 1 ||


ಜಟಾಕಟಾಹಸಂಭ್ರಮಭ್ರಮನ್ನಿಲಿಂಪನಿರ್ಝರೀ-

-ವಿಲೋಲವೀಚಿವಲ್ಲರೀವಿರಾಜಮಾನಮೂರ್ಧನಿ |

ಧಗದ್ಧಗದ್ಧಗಜ್ಜ್ವಲಲ್ಲಲಾಟಪಟ್ಟಪಾವಕೇ

ಕಿಶೋರಚಂದ್ರಶೇಖರೇ ರತಿಃ ಪ್ರತಿಕ್ಷಣಂ ಮಮ || 2 ||


ಧರಾಧರೇಂದ್ರನಂದಿನೀವಿಲಾಸಬಂಧುಬಂಧುರ

ಸ್ಫುರದ್ದಿಗಂತಸಂತತಿಪ್ರಮೋದಮಾನಮಾನಸೇ |

ಕೃಪಾಕಟಾಕ್ಷಧೋರಣೀನಿರುದ್ಧದುರ್ಧರಾಪದಿ

ಕ್ವಚಿದ್ದಿಗಂಬರೇ ಮನೋ ವಿನೋದಮೇತು ವಸ್ತುನಿ || 3 ||


ಜಟಾಭುಜಂಗಪಿಂಗಳಸ್ಫುರತ್ಫಣಾಮಣಿಪ್ರಭಾ

ಕದಂಬಕುಂಕುಮದ್ರವಪ್ರಲಿಪ್ತದಿಗ್ವಧೂಮುಖೇ |

ಮದಾಂಧಸಿಂಧುರಸ್ಫುರತ್ತ್ವಗುತ್ತರೀಯಮೇದುರೇ

ಮನೋ ವಿನೋದಮದ್ಭುತಂ ಬಿಭರ್ತು ಭೂತಭರ್ತರಿ || 4 ||


ಸಹಸ್ರಲೋಚನಪ್ರಭೃತ್ಯಶೇಷಲೇಖಶೇಖರ

ಪ್ರಸೂನಧೂಳಿಧೋರಣೀ ವಿಧೂಸರಾಂಘ್ರಿಪೀಠಭೂಃ |

ಭುಜಂಗರಾಜಮಾಲಯಾ ನಿಬದ್ಧಜಾಟಜೂಟಕ

ಶ್ರಿಯೈ ಚಿರಾಯ ಜಾಯತಾಂ ಚಕೋರಬಂಧುಶೇಖರಃ || 5 ||


ಲಲಾಟಚತ್ವರಜ್ವಲದ್ಧನಂಜಯಸ್ಫುಲಿಂಗಭಾ-

-ನಿಪೀತಪಂಚಸಾಯಕಂ ನಮನ್ನಿಲಿಂಪನಾಯಕಮ್ |

ಸುಧಾಮಯೂಖಲೇಖಯಾ ವಿರಾಜಮಾನಶೇಖರಂ

ಮಹಾಕಪಾಲಿಸಂಪದೇಶಿರೋಜಟಾಲಮಸ್ತು ನಃ || 6 ||


ಕರಾಲಫಾಲಪಟ್ಟಿಕಾಧಗದ್ಧಗದ್ಧಗಜ್ಜ್ವಲ-

ದ್ಧನಂಜಯಾಧರೀಕೃತಪ್ರಚಂಡಪಂಚಸಾಯಕೇ |

ಧರಾಧರೇಂದ್ರನಂದಿನೀಕುಚಾಗ್ರಚಿತ್ರಪತ್ರಕ-

-ಪ್ರಕಲ್ಪನೈಕಶಿಲ್ಪಿನಿ ತ್ರಿಲೋಚನೇ ಮತಿರ್ಮಮ || 7 ||


ನವೀನಮೇಘಮಂಡಲೀ ನಿರುದ್ಧದುರ್ಧರಸ್ಫುರತ್-

ಕುಹೂನಿಶೀಥಿನೀತಮಃ ಪ್ರಬಂಧಬಂಧುಕಂಧರಃ |

ನಿಲಿಂಪನಿರ್ಝರೀಧರಸ್ತನೋತು ಕೃತ್ತಿಸಿಂಧುರಃ

ಕಳಾನಿಧಾನಬಂಧುರಃ ಶ್ರಿಯಂ ಜಗದ್ಧುರಂಧರಃ || 8 ||


ಪ್ರಫುಲ್ಲನೀಲಪಂಕಜಪ್ರಪಂಚಕಾಲಿಮಪ್ರಭಾ-

-ವಿಲಂಬಿಕಂಠಕಂದಲೀರುಚಿಪ್ರಬದ್ಧಕಂಧರಮ್ |

ಸ್ಮರಚ್ಛಿದಂ ಪುರಚ್ಛಿದಂ ಭವಚ್ಛಿದಂ ಮಖಚ್ಛಿದಂ

ಗಜಚ್ಛಿದಾಂಧಕಚ್ಛಿದಂ ತಮಂತಕಚ್ಛಿದಂ ಭಜೇ || 9 ||


ಅಗರ್ವಸರ್ವಮಂಗಳಾಕಳಾಕದಂಬಮಂಜರೀ

ರಸಪ್ರವಾಹಮಾಧುರೀ ವಿಜೃಂಭಣಾಮಧುವ್ರತಮ್ |

ಸ್ಮರಾಂತಕಂ ಪುರಾಂತಕಂ ಭವಾಂತಕಂ ಮಖಾಂತಕಂ

ಗಜಾಂತಕಾಂಧಕಾಂತಕಂ ತಮಂತಕಾಂತಕಂ ಭಜೇ || 10 ||


ಜಯತ್ವದಭ್ರವಿಭ್ರಮಭ್ರಮದ್ಭುಜಂಗಮಶ್ವಸ-

-ದ್ವಿನಿರ್ಗಮತ್ಕ್ರಮಸ್ಫುರತ್ಕರಾಲಫಾಲಹವ್ಯವಾಟ್ |

ಧಿಮಿದ್ಧಿಮಿದ್ಧಿಮಿಧ್ವನನ್ಮೃದಂಗತುಂಗಮಂಗಳ

ಧ್ವನಿಕ್ರಮಪ್ರವರ್ತಿತ ಪ್ರಚಂಡತಾಂಡವಃ ಶಿವಃ || 11 ||


ದೃಷದ್ವಿಚಿತ್ರತಲ್ಪಯೋರ್ಭುಜಂಗಮೌಕ್ತಿಕಸ್ರಜೋರ್-

-ಗರಿಷ್ಠರತ್ನಲೋಷ್ಠಯೋಃ ಸುಹೃದ್ವಿಪಕ್ಷಪಕ್ಷಯೋಃ |

ತೃಷ್ಣಾರವಿಂದಚಕ್ಷುಷೋಃ ಪ್ರಜಾಮಹೀಮಹೇಂದ್ರಯೋಃ

ಸಮಂ ಪ್ರವರ್ತಯನ್ಮನಃ ಕದಾ ಸದಾಶಿವಂ ಭಜೇ || 12 ||


ಕದಾ ನಿಲಿಂಪನಿರ್ಝರೀನಿಕುಂಜಕೋಟರೇ ವಸನ್

ವಿಮುಕ್ತದುರ್ಮತಿಃ ಸದಾ ಶಿರಃಸ್ಥಮಂಜಲಿಂ ವಹನ್ |

ವಿಮುಕ್ತಲೋಲಲೋಚನೋ ಲಲಾಟಫಾಲಲಗ್ನಕಃ

ಶಿವೇತಿ ಮಂತ್ರಮುಚ್ಚರನ್ ಸದಾ ಸುಖೀ ಭವಾಮ್ಯಹಮ್ || 13 ||


ಇಮಂ ಹಿ ನಿತ್ಯಮೇವಮುಕ್ತಮುತ್ತಮೋತ್ತಮಂ ಸ್ತವಂ

ಪಠನ್ಸ್ಮರನ್ಬ್ರುವನ್ನರೋ ವಿಶುದ್ಧಿಮೇತಿಸಂತತಮ್ |

ಹರೇ ಗುರೌ ಸುಭಕ್ತಿಮಾಶು ಯಾತಿ ನಾನ್ಯಥಾ ಗತಿಂ

ವಿಮೋಹನಂ ಹಿ ದೇಹಿನಾಂ ಸುಶಂಕರಸ್ಯ ಚಿಂತನಮ್ || 14 ||


ಪೂಜಾವಸಾನಸಮಯೇ ದಶವಕ್ತ್ರಗೀತಂ ಯಃ

ಶಂಭುಪೂಜನಪರಂ ಪಠತಿ ಪ್ರದೋಷೇ |

ತಸ್ಯ ಸ್ಥಿರಾಂ ರಥಗಜೇಂದ್ರತುರಂಗಯುಕ್ತಾಂ

ಲಕ್ಷ್ಮೀಂ ಸದೈವ ಸುಮುಖಿಂ ಪ್ರದದಾತಿ ಶಂಭುಃ || 15 ||



Shiv Tandav Stotram Lyrics in Sanskrit - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। 

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥

 

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।

विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥

 

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

 

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

 

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-

प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः

श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

 

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

 

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

 

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ 

 

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

 

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

 

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

 

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

 

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥

 

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

 

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

 

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

 

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

 


Shiv Tandav Stotram Lyrics in Telugu - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ సార్థశివతాణ్డవస్తోత్రమ్ ॥


॥ శ్రీగణేశాయ నమః ॥


జటాటవీగలజ్జలప్రవాహపావితస్థలే

గలేవలంబ్య లంబితాం భుజంగతుంగమాలికామ్ |

డమడ్డమడ్డమడ్డమన్నినాదవడ్డమర్వయం

చకార చండతాండవం తనోతు నః శివః శివమ్ || 1 ||


జటాకటాహసంభ్రమభ్రమన్నిలింపనిర్ఝరీ-

-విలోలవీచివల్లరీవిరాజమానమూర్ధని |

ధగద్ధగద్ధగజ్జ్వలల్లలాటపట్టపావకే

కిశోరచంద్రశేఖరే రతిః ప్రతిక్షణం మమ || 2 ||


ధరాధరేంద్రనందినీవిలాసబంధుబంధుర

స్ఫురద్దిగంతసంతతిప్రమోదమానమానసే |

కృపాకటాక్షధోరణీనిరుద్ధదుర్ధరాపది

క్వచిద్దిగంబరే మనో వినోదమేతు వస్తుని || 3 ||


జటాభుజంగపింగళస్ఫురత్ఫణామణిప్రభా

కదంబకుంకుమద్రవప్రలిప్తదిగ్వధూముఖే |

మదాంధసింధురస్ఫురత్త్వగుత్తరీయమేదురే

మనో వినోదమద్భుతం బిభర్తు భూతభర్తరి || 4 ||


సహస్రలోచనప్రభృత్యశేషలేఖశేఖర

ప్రసూనధూళిధోరణీ విధూసరాంఘ్రిపీఠభూః |

భుజంగరాజమాలయా నిబద్ధజాటజూటక

శ్రియై చిరాయ జాయతాం చకోరబంధుశేఖరః || 5 ||


లలాటచత్వరజ్వలద్ధనంజయస్ఫులింగభా-

-నిపీతపంచసాయకం నమన్నిలింపనాయకమ్ |

సుధామయూఖలేఖయా విరాజమానశేఖరం

మహాకపాలిసంపదేశిరోజటాలమస్తు నః || 6 ||


కరాలఫాలపట్టికాధగద్ధగద్ధగజ్జ్వల-

ద్ధనంజయాధరీకృతప్రచండపంచసాయకే |

ధరాధరేంద్రనందినీకుచాగ్రచిత్రపత్రక-

-ప్రకల్పనైకశిల్పిని త్రిలోచనే మతిర్మమ || 7 ||


నవీనమేఘమండలీ నిరుద్ధదుర్ధరస్ఫురత్-

కుహూనిశీథినీతమః ప్రబంధబంధుకంధరః |

నిలింపనిర్ఝరీధరస్తనోతు కృత్తిసింధురః

కళానిధానబంధురః శ్రియం జగద్ధురంధరః || 8 ||


ప్రఫుల్లనీలపంకజప్రపంచకాలిమప్రభా-

-విలంబికంఠకందలీరుచిప్రబద్ధకంధరమ్ |

స్మరచ్ఛిదం పురచ్ఛిదం భవచ్ఛిదం మఖచ్ఛిదం

గజచ్ఛిదాంధకచ్ఛిదం తమంతకచ్ఛిదం భజే || 9 ||


అగర్వసర్వమంగళాకళాకదంబమంజరీ

రసప్రవాహమాధురీ విజృంభణామధువ్రతమ్ |

స్మరాంతకం పురాంతకం భవాంతకం మఖాంతకం

గజాంతకాంధకాంతకం తమంతకాంతకం భజే || 10 ||


జయత్వదభ్రవిభ్రమభ్రమద్భుజంగమశ్వస-

-ద్వినిర్గమత్క్రమస్ఫురత్కరాలఫాలహవ్యవాట్ |

ధిమిద్ధిమిద్ధిమిధ్వనన్మృదంగతుంగమంగళ

ధ్వనిక్రమప్రవర్తిత ప్రచండతాండవః శివః || 11 ||


దృషద్విచిత్రతల్పయోర్భుజంగమౌక్తికస్రజోర్-

-గరిష్ఠరత్నలోష్ఠయోః సుహృద్విపక్షపక్షయోః |

తృష్ణారవిందచక్షుషోః ప్రజామహీమహేంద్రయోః

సమం ప్రవర్తయన్మనః కదా సదాశివం భజే || 12 ||


కదా నిలింపనిర్ఝరీనికుంజకోటరే వసన్

విముక్తదుర్మతిః సదా శిరఃస్థమంజలిం వహన్ |

విముక్తలోలలోచనో లలాటఫాలలగ్నకః

శివేతి మంత్రముచ్చరన్ సదా సుఖీ భవామ్యహమ్ || 13 ||


ఇమం హి నిత్యమేవముక్తముత్తమోత్తమం స్తవం

పఠన్స్మరన్బ్రువన్నరో విశుద్ధిమేతిసంతతమ్ |

హరే గురౌ సుభక్తిమాశు యాతి నాన్యథా గతిం

విమోహనం హి దేహినాం సుశంకరస్య చింతనమ్ || 14 ||


పూజావసానసమయే దశవక్త్రగీతం యః

శంభుపూజనపరం పఠతి ప్రదోషే |

తస్య స్థిరాం రథగజేంద్రతురంగయుక్తాం

లక్ష్మీం సదైవ సుముఖిం ప్రదదాతి శంభుః || 15 ||



Shiv Tandav Stotram Lyrics in Tamil - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ ஸார்த²ஶிவதாண்ட³வஸ்தோத்ரம் ॥


॥ ஶ்ரீக³ணேஶாய நம: ॥


ஜடாடவீகலஜ்ஜலப்ரவாஹபாவிதஸ்தலே

கலேவலம்ப்ய லம்பிதாம் புஜம்கதும்கமாலிகாம் |

டமட்டமட்டமட்டமன்னினாதவட்டமர்வயம்

சகார சம்டதாம்டவம் தனோது னஃ ஶிவஃ ஶிவம் || 1 ||


ஜடாகடாஹஸம்ப்ரமப்ரமன்னிலிம்பனிர்ஜரீ-

-விலோலவீசிவல்லரீவிராஜமானமூர்தனி |

தகத்தகத்தகஜ்ஜ்வலல்லலாடபட்டபாவகே

கிஶோரசம்த்ரஶேகரே ரதிஃ ப்ரதிக்ஷணம் மம || 2 ||


தராதரேம்த்ரனம்தினீவிலாஸபம்துபம்துர

ஸ்புரத்திகம்தஸம்ததிப்ரமோதமானமானஸே |

க்றுபாகடாக்ஷதோரணீனிருத்ததுர்தராபதி

க்வசித்திகம்பரே மனோ வினோதமேது வஸ்துனி || 3 ||


ஜடாபுஜம்கபிம்களஸ்புரத்பணாமணிப்ரபா

கதம்பகும்குமத்ரவப்ரலிப்ததிக்வதூமுகே |

மதாம்தஸிம்துரஸ்புரத்த்வகுத்தரீயமேதுரே

மனோ வினோதமத்புதம் பிபர்து பூதபர்தரி || 4 ||


ஸஹஸ்ரலோசனப்ரப்றுத்யஶேஷலேகஶேகர

ப்ரஸூனதூளிதோரணீ விதூஸராம்க்ரிபீடபூஃ |

புஜம்கராஜமாலயா னிபத்தஜாடஜூடக

ஶ்ரியை சிராய ஜாயதாம் சகோரபம்துஶேகரஃ || 5 ||


லலாடசத்வரஜ்வலத்தனம்ஜயஸ்புலிம்கபா-

-னிபீதபம்சஸாயகம் னமன்னிலிம்பனாயகம் |

ஸுதாமயூகலேகயா விராஜமானஶேகரம்

மஹாகபாலிஸம்பதேஶிரோஜடாலமஸ்து னஃ || 6 ||


கராலபாலபட்டிகாதகத்தகத்தகஜ்ஜ்வல-

த்தனம்ஜயாதரீக்றுதப்ரசம்டபம்சஸாயகே |

தராதரேம்த்ரனம்தினீகுசாக்ரசித்ரபத்ரக-

-ப்ரகல்பனைகஶில்பினி த்ரிலோசனே மதிர்மம || 7 ||


னவீனமேகமம்டலீ னிருத்ததுர்தரஸ்புரத்-

குஹூனிஶீதினீதமஃ ப்ரபம்தபம்துகம்தரஃ |

னிலிம்பனிர்ஜரீதரஸ்தனோது க்றுத்திஸிம்துரஃ

களானிதானபம்துரஃ ஶ்ரியம் ஜகத்துரம்தரஃ || 8 ||


ப்ரபுல்லனீலபம்கஜப்ரபம்சகாலிமப்ரபா-

-விலம்பிகம்டகம்தலீருசிப்ரபத்தகம்தரம் |

ஸ்மரச்சிதம் புரச்சிதம் பவச்சிதம் மகச்சிதம்

கஜச்சிதாம்தகச்சிதம் தமம்தகச்சிதம் பஜே || 9 ||


அகர்வஸர்வமம்களாகளாகதம்பமம்ஜரீ

ரஸப்ரவாஹமாதுரீ விஜ்றும்பணாமதுவ்ரதம் |

ஸ்மராம்தகம் புராம்தகம் பவாம்தகம் மகாம்தகம்

கஜாம்தகாம்தகாம்தகம் தமம்தகாம்தகம் பஜே || 10 ||


ஜயத்வதப்ரவிப்ரமப்ரமத்புஜம்கமஶ்வஸ-

-த்வினிர்கமத்க்ரமஸ்புரத்கராலபாலஹவ்யவாட் |

திமித்திமித்திமித்வனன்ம்றுதம்கதும்கமம்கள

த்வனிக்ரமப்ரவர்தித ப்ரசம்டதாம்டவஃ ஶிவஃ || 11 ||


த்றுஷத்விசித்ரதல்பயோர்புஜம்கமௌக்திகஸ்ரஜோர்-

-கரிஷ்டரத்னலோஷ்டயோஃ ஸுஹ்றுத்விபக்ஷபக்ஷயோஃ |

த்றுஷ்ணாரவிம்தசக்ஷுஷோஃ ப்ரஜாமஹீமஹேம்த்ரயோஃ

ஸமம் ப்ரவர்தயன்மனஃ கதா ஸதாஶிவம் பஜே || 12 ||


கதா னிலிம்பனிர்ஜரீனிகும்ஜகோடரே வஸன்

விமுக்ததுர்மதிஃ ஸதா ஶிரஃஸ்தமம்ஜலிம் வஹன் |

விமுக்தலோலலோசனோ லலாடபாலலக்னகஃ

ஶிவேதி மம்த்ரமுச்சரன் ஸதா ஸுகீ பவாம்யஹம் || 13 ||


இமம் ஹி னித்யமேவமுக்தமுத்தமோத்தமம் ஸ்தவம்

படன்ஸ்மரன்ப்ருவன்னரோ விஶுத்திமேதிஸம்ததம் |

ஹரே குரௌ ஸுபக்திமாஶு யாதி னான்யதா கதிம்

விமோஹனம் ஹி தேஹினாம் ஸுஶம்கரஸ்ய சிம்தனம் || 14 ||


பூஜாவஸானஸமயே தஶவக்த்ரகீதம் யஃ

ஶம்புபூஜனபரம் படதி ப்ரதோஷே |

தஸ்ய ஸ்திராம் ரதகஜேம்த்ரதுரம்கயுக்தாம்

லக்ஷ்மீம் ஸதைவ ஸுமுகிம் ப்ரததாதி ஶம்புஃ || 15 ||



Shiv Tandav Stotram Lyrics in Bengali - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ সার্থশিবতাণ্ডবস্তোত্রম্ ॥

॥ শ্রীগণেশায় নমঃ ॥

জটাটবীগলজ্জলপ্রবাহপাবিতস্থলে
গলেবলংব্য় লংবিতাং ভুজংগতুংগমালিকাম |
ডমড্ডমড্ডমড্ডমন্নিনাদবড্ডমর্বয়ং
চকার চংডতাংডবং তনোতু নঃ শিবঃ শিবম || 1 ||

জটাকটাহসংভ্রমভ্রমন্নিলিংপনির্ঝরী-
-বিলোলবীচিবল্লরীবিরাজমানমূর্ধনি |
ধগদ্ধগদ্ধগজ্জ্বলল্ললাটপট্টপাবকে
কিশোরচংদ্রশেখরে রতিঃ প্রতিক্ষণং মম || 2 ||

ধরাধরেংদ্রনংদিনীবিলাসবংধুবংধুর
স্ফুরদ্দিগংতসংততিপ্রমোদমানমানসে |
কৃপাকটাক্ষধোরণীনিরুদ্ধদুর্ধরাপদি
ক্বচিদ্দিগংবরে মনো বিনোদমেতু বস্তুনি || 3 ||

জটাভুজংগপিংগলস্ফুরত্ফণামণিপ্রভা
কদংবকুংকুমদ্রবপ্রলিপ্তদিগ্বধূমুখে |
মদাংধসিংধুরস্ফুরত্ত্বগুত্তরীয়মেদুরে
মনো বিনোদমদ্ভুতং বিভর্তু ভূতভর্তরি || 4 ||

সহস্রলোচনপ্রভৃত্য়শেষলেখশেখর
প্রসূনধূলিধোরণী বিধূসরাংঘ্রিপীঠভূঃ |
ভুজংগরাজমালয়া নিবদ্ধজাটজূটক
শ্রিয়ৈ চিরায় জায়তাং চকোরবংধুশেখরঃ || 5 ||

ললাটচত্বরজ্বলদ্ধনংজয়স্ফুলিংগভা-
-নিপীতপংচসায়কং নমন্নিলিংপনায়কম |
সুধাময়ূখলেখয়া বিরাজমানশেখরং
মহাকপালিসংপদেশিরোজটালমস্তু নঃ || 6 ||

করালফালপট্টিকাধগদ্ধগদ্ধগজ্জ্বল-
দ্ধনংজয়াধরীকৃতপ্রচংডপংচসায়কে |
ধরাধরেংদ্রনংদিনীকুচাগ্রচিত্রপত্রক-
-প্রকল্পনৈকশিল্পিনি ত্রিলোচনে মতির্মম || 7 ||

নবীনমেঘমংডলী নিরুদ্ধদুর্ধরস্ফুরত-
কুহূনিশীথিনীতমঃ প্রবংধবংধুকংধরঃ |
নিলিংপনির্ঝরীধরস্তনোতু কৃত্তিসিংধুরঃ
কলানিধানবংধুরঃ শ্রিয়ং জগদ্ধুরংধরঃ || 8 ||

প্রফুল্লনীলপংকজপ্রপংচকালিমপ্রভা-
-বিলংবিকংঠকংদলীরুচিপ্রবদ্ধকংধরম |
স্মরচ্ছিদং পুরচ্ছিদং ভবচ্ছিদং মখচ্ছিদং
গজচ্ছিদাংধকচ্ছিদং তমংতকচ্ছিদং ভজে || 9 ||

অগর্বসর্বমংগলাকলাকদংবমংজরী
রসপ্রবাহমাধুরী বিজৃংভণামধুব্রতম |
স্মরাংতকং পুরাংতকং ভবাংতকং মখাংতকং
গজাংতকাংধকাংতকং তমংতকাংতকং ভজে || 1০ ||

জয়ত্বদভ্রবিভ্রমভ্রমদ্ভুজংগমশ্বস-
-দ্বিনির্গমত্ক্রমস্ফুরত্করালফালহব্য়বাট |
ধিমিদ্ধিমিদ্ধিমিধ্বনন্মৃদংগতুংগমংগল
ধ্বনিক্রমপ্রবর্তিত প্রচংডতাংডবঃ শিবঃ || 11 ||

দৃষদ্বিচিত্রতল্পয়োর্ভুজংগমৌক্তিকস্রজোর-
-গরিষ্ঠরত্নলোষ্ঠয়োঃ সুহৃদ্বিপক্ষপক্ষয়োঃ |
তৃষ্ণারবিংদচক্ষুষোঃ প্রজামহীমহেংদ্রয়োঃ
সমং প্রবর্তয়ন্মনঃ কদা সদাশিবং ভজে || 12 ||

কদা নিলিংপনির্ঝরীনিকুংজকোটরে বসন
বিমুক্তদুর্মতিঃ সদা শিরঃস্থমংজলিং বহন |
বিমুক্তলোললোচনো ললাটফাললগ্নকঃ
শিবেতি মংত্রমুচ্চরন সদা সুখী ভবাম্য়হম || 13 ||

ইমং হি নিত্য়মেবমুক্তমুত্তমোত্তমং স্তবং
পঠন্স্মরন্ব্রুবন্নরো বিশুদ্ধিমেতিসংততম |
হরে গুরৌ সুভক্তিমাশু য়াতি নান্য়থা গতিং
বিমোহনং হি দেহিনাং সুশংকরস্য় চিংতনম || 14 ||

পূজাবসানসময়ে দশবক্ত্রগীতং য়ঃ
শংভুপূজনপরং পঠতি প্রদোষে |
তস্য় স্থিরাং রথগজেংদ্রতুরংগয়ুক্তাং
লক্ষ্মীং সদৈব সুমুখিং প্রদদাতি শংভুঃ || 15 ||


Shiv Tandav Stotram Lyrics in Oriya - jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ ସାର୍ଥଶିଵତାଣ୍ଡଵସ୍ତୋତ୍ରମ୍ ॥

॥ ଶ୍ରୀଗଣେଶାୟ ନମଃ ॥

ଜଟାଟଵୀଗଲଜ୍ଜଲପ୍ରଵାହପାଵିତସ୍ଥଲେ
ଗଲେଵଲଂବ୍ଯ ଲଂବିତାଂ ଭୁଜଂଗତୁଂଗମାଲିକାମ୍ |
ଡମଡ୍ଡମଡ୍ଡମଡ୍ଡମନ୍ନିନାଦଵଡ୍ଡମର୍ଵଯଂ
ଚକାର ଚଂଡତାଂଡଵଂ ତନୋତୁ ନଃ ଶିଵଃ ଶିଵମ୍ || 1 ||

ଜଟାକଟାହସଂଭ୍ରମଭ୍ରମନ୍ନିଲିଂପନିର୍ଝରୀ-
-ଵିଲୋଲଵୀଚିଵଲ୍ଲରୀଵିରାଜମାନମୂର୍ଧନି |
ଧଗଦ୍ଧଗଦ୍ଧଗଜ୍ଜ୍ଵଲଲ୍ଲଲାଟପଟ୍ଟପାଵକେ
କିଶୋରଚଂଦ୍ରଶେଖରେ ରତିଃ ପ୍ରତିକ୍ଷଣଂ ମମ || 2 ||

ଧରାଧରେଂଦ୍ରନଂଦିନୀଵିଲାସବଂଧୁବଂଧୁର
ସ୍ଫୁରଦ୍ଦିଗଂତସଂତତିପ୍ରମୋଦମାନମାନସେ |
କୃପାକଟାକ୍ଷଧୋରଣୀନିରୁଦ୍ଧଦୁର୍ଧରାପଦି
କ୍ଵଚିଦ୍ଦିଗଂବରେ ମନୋ ଵିନୋଦମେତୁ ଵସ୍ତୁନି || 3 ||

ଜଟାଭୁଜଂଗପିଂଗଳସ୍ଫୁରତ୍ଫଣାମଣିପ୍ରଭା
କଦଂବକୁଂକୁମଦ୍ରଵପ୍ରଲିପ୍ତଦିଗ୍ଵଧୂମୁଖେ |
ମଦାଂଧସିଂଧୁରସ୍ଫୁରତ୍ତ୍ଵଗୁତ୍ତରୀଯମେଦୁରେ
ମନୋ ଵିନୋଦମଦ୍ଭୁତଂ ବିଭର୍ତୁ ଭୂତଭର୍ତରି || 4 ||

ସହସ୍ରଲୋଚନପ୍ରଭୃତ୍ଯଶେଷଲେଖଶେଖର
ପ୍ରସୂନଧୂଳିଧୋରଣୀ ଵିଧୂସରାଂଘ୍ରିପୀଠଭୂଃ |
ଭୁଜଂଗରାଜମାଲଯା ନିବଦ୍ଧଜାଟଜୂଟକ
ଶ୍ରିଯୈ ଚିରାଯ ଜାଯତାଂ ଚକୋରବଂଧୁଶେଖରଃ || 5 ||

ଲଲାଟଚତ୍ଵରଜ୍ଵଲଦ୍ଧନଂଜଯସ୍ଫୁଲିଂଗଭା-
-ନିପୀତପଂଚସାଯକଂ ନମନ୍ନିଲିଂପନାଯକମ୍ |
ସୁଧାମଯୂଖଲେଖଯା ଵିରାଜମାନଶେଖରଂ
ମହାକପାଲିସଂପଦେଶିରୋଜଟାଲମସ୍ତୁ ନଃ || 6 ||

କରାଲଫାଲପଟ୍ଟିକାଧଗଦ୍ଧଗଦ୍ଧଗଜ୍ଜ୍ଵଲ-
ଦ୍ଧନଂଜଯାଧରୀକୃତପ୍ରଚଂଡପଂଚସାଯକେ |
ଧରାଧରେଂଦ୍ରନଂଦିନୀକୁଚାଗ୍ରଚିତ୍ରପତ୍ରକ-
-ପ୍ରକଲ୍ପନୈକଶିଲ୍ପିନି ତ୍ରିଲୋଚନେ ମତିର୍ମମ || 7 ||

ନଵୀନମେଘମଂଡଲୀ ନିରୁଦ୍ଧଦୁର୍ଧରସ୍ଫୁରତ୍-
କୁହୂନିଶୀଥିନୀତମଃ ପ୍ରବଂଧବଂଧୁକଂଧରଃ |
ନିଲିଂପନିର୍ଝରୀଧରସ୍ତନୋତୁ କୃତ୍ତିସିଂଧୁରଃ
କଳାନିଧାନବଂଧୁରଃ ଶ୍ରିଯଂ ଜଗଦ୍ଧୁରଂଧରଃ || 8 ||

ପ୍ରଫୁଲ୍ଲନୀଲପଂକଜପ୍ରପଂଚକାଲିମପ୍ରଭା-
-ଵିଲଂବିକଂଠକଂଦଲୀରୁଚିପ୍ରବଦ୍ଧକଂଧରମ୍ |
ସ୍ମରଚ୍ଛିଦଂ ପୁରଚ୍ଛିଦଂ ଭଵଚ୍ଛିଦଂ ମଖଚ୍ଛିଦଂ
ଗଜଚ୍ଛିଦାଂଧକଚ୍ଛିଦଂ ତମଂତକଚ୍ଛିଦଂ ଭଜେ || 9 ||

ଅଗର୍ଵସର୍ଵମଂଗଳାକଳାକଦଂବମଂଜରୀ
ରସପ୍ରଵାହମାଧୁରୀ ଵିଜୃଂଭଣାମଧୁଵ୍ରତମ୍ |
ସ୍ମରାଂତକଂ ପୁରାଂତକଂ ଭଵାଂତକଂ ମଖାଂତକଂ
ଗଜାଂତକାଂଧକାଂତକଂ ତମଂତକାଂତକଂ ଭଜେ || 10 ||

ଜଯତ୍ଵଦଭ୍ରଵିଭ୍ରମଭ୍ରମଦ୍ଭୁଜଂଗମଶ୍ଵସ-
-ଦ୍ଵିନିର୍ଗମତ୍କ୍ରମସ୍ଫୁରତ୍କରାଲଫାଲହଵ୍ଯଵାଟ୍ |
ଧିମିଦ୍ଧିମିଦ୍ଧିମିଧ୍ଵନନ୍ମୃଦଂଗତୁଂଗମଂଗଳ
ଧ୍ଵନିକ୍ରମପ୍ରଵର୍ତିତ ପ୍ରଚଂଡତାଂଡଵଃ ଶିଵଃ || 11 ||

ଦୃଷଦ୍ଵିଚିତ୍ରତଲ୍ପଯୋର୍ଭୁଜଂଗମୌକ୍ତିକସ୍ରଜୋର୍-
-ଗରିଷ୍ଠରତ୍ନଲୋଷ୍ଠଯୋଃ ସୁହୃଦ୍ଵିପକ୍ଷପକ୍ଷଯୋଃ |
ତୃଷ୍ଣାରଵିଂଦଚକ୍ଷୁଷୋଃ ପ୍ରଜାମହୀମହେଂଦ୍ରଯୋଃ
ସମଂ ପ୍ରଵର୍ତଯନ୍ମନଃ କଦା ସଦାଶିଵଂ ଭଜେ || 12 ||

କଦା ନିଲିଂପନିର୍ଝରୀନିକୁଂଜକୋଟରେ ଵସନ୍
ଵିମୁକ୍ତଦୁର୍ମତିଃ ସଦା ଶିରଃସ୍ଥମଂଜଲିଂ ଵହନ୍ |
ଵିମୁକ୍ତଲୋଲଲୋଚନୋ ଲଲାଟଫାଲଲଗ୍ନକଃ
ଶିଵେତି ମଂତ୍ରମୁଚ୍ଚରନ୍ ସଦା ସୁଖୀ ଭଵାମ୍ଯହମ୍ || 13 ||

ଇମଂ ହି ନିତ୍ଯମେଵମୁକ୍ତମୁତ୍ତମୋତ୍ତମଂ ସ୍ତଵଂ
ପଠନ୍ସ୍ମରନ୍ବ୍ରୁଵନ୍ନରୋ ଵିଶୁଦ୍ଧିମେତିସଂତତମ୍ |
ହରେ ଗୁରୌ ସୁଭକ୍ତିମାଶୁ ଯାତି ନାନ୍ଯଥା ଗତିଂ
ଵିମୋହନଂ ହି ଦେହିନାଂ ସୁଶଂକରସ୍ଯ ଚିଂତନମ୍ || 14 ||

ପୂଜାଵସାନସମଯେ ଦଶଵକ୍ତ୍ରଗୀତଂ ଯଃ
ଶଂଭୁପୂଜନପରଂ ପଠତି ପ୍ରଦୋଷେ |
ତସ୍ଯ ସ୍ଥିରାଂ ରଥଗଜେଂଦ୍ରତୁରଂଗଯୁକ୍ତାଂ
ଲକ୍ଷ୍ମୀଂ ସଦୈଵ ସୁମୁଖିଂ ପ୍ରଦଦାତି ଶଂଭୁଃ || 15 ||


Shiv Tandav Stotram Lyrics in Malyalam- jatatavigalajjala pravahapavitasthale


॥ സാര്‍ഥശിവതാണ്ഡവസ്തോത്രം ॥

॥ ശ്രീഗണേശായ നമഃ ॥

ജടാടവീഗലജ്ജലപ്രവാഹപാവിതസ്ഥലേ
ഗലേവലംബ്യ ലംബിതാം ഭുജംഗതുംഗമാലികാമ് |
ഡമഡ്ഡമഡ്ഡമഡ്ഡമന്നിനാദവഡ്ഡമര്വയം
ചകാര ചംഡതാംഡവം തനോതു നഃ ശിവഃ ശിവമ് || 1 ||

ജടാകടാഹസംഭ്രമഭ്രമന്നിലിംപനിര്ഝരീ-
-വിലോലവീചിവല്ലരീവിരാജമാനമൂര്ധനി |
ധഗദ്ധഗദ്ധഗജ്ജ്വലല്ലലാടപട്ടപാവകേ
കിശോരചംദ്രശേഖരേ രതിഃ പ്രതിക്ഷണം മമ || 2 ||

ധരാധരേംദ്രനംദിനീവിലാസബംധുബംധുര
സ്ഫുരദ്ദിഗംതസംതതിപ്രമോദമാനമാനസേ |
കൃപാകടാക്ഷധോരണീനിരുദ്ധദുര്ധരാപദി
ക്വചിദ്ദിഗംബരേ മനോ വിനോദമേതു വസ്തുനി || 3 ||

ജടാഭുജംഗപിംഗളസ്ഫുരത്ഫണാമണിപ്രഭാ
കദംബകുംകുമദ്രവപ്രലിപ്തദിഗ്വധൂമുഖേ |
മദാംധസിംധുരസ്ഫുരത്ത്വഗുത്തരീയമേദുരേ
മനോ വിനോദമദ്ഭുതം ബിഭര്തു ഭൂതഭര്തരി || 4 ||

സഹസ്രലോചനപ്രഭൃത്യശേഷലേഖശേഖര
പ്രസൂനധൂളിധോരണീ വിധൂസരാംഘ്രിപീഠഭൂഃ |
ഭുജംഗരാജമാലയാ നിബദ്ധജാടജൂടക
ശ്രിയൈ ചിരായ ജായതാം ചകോരബംധുശേഖരഃ || 5 ||

ലലാടചത്വരജ്വലദ്ധനംജയസ്ഫുലിംഗഭാ-
-നിപീതപംചസായകം നമന്നിലിംപനായകമ് |
സുധാമയൂഖലേഖയാ വിരാജമാനശേഖരം
മഹാകപാലിസംപദേശിരോജടാലമസ്തു നഃ || 6 ||

കരാലഫാലപട്ടികാധഗദ്ധഗദ്ധഗജ്ജ്വല-
ദ്ധനംജയാധരീകൃതപ്രചംഡപംചസായകേ |
ധരാധരേംദ്രനംദിനീകുചാഗ്രചിത്രപത്രക-
-പ്രകല്പനൈകശില്പിനി ത്രിലോചനേ മതിര്മമ || 7 ||

നവീനമേഘമംഡലീ നിരുദ്ധദുര്ധരസ്ഫുരത്-
കുഹൂനിശീഥിനീതമഃ പ്രബംധബംധുകംധരഃ |
നിലിംപനിര്ഝരീധരസ്തനോതു കൃത്തിസിംധുരഃ
കളാനിധാനബംധുരഃ ശ്രിയം ജഗദ്ധുരംധരഃ || 8 ||

പ്രഫുല്ലനീലപംകജപ്രപംചകാലിമപ്രഭാ-
-വിലംബികംഠകംദലീരുചിപ്രബദ്ധകംധരമ് |
സ്മരച്ഛിദം പുരച്ഛിദം ഭവച്ഛിദം മഖച്ഛിദം
ഗജച്ഛിദാംധകച്ഛിദം തമംതകച്ഛിദം ഭജേ || 9 ||

അഗര്വസര്വമംഗളാകളാകദംബമംജരീ
രസപ്രവാഹമാധുരീ വിജൃംഭണാമധുവ്രതമ് |
സ്മരാംതകം പുരാംതകം ഭവാംതകം മഖാംതകം
ഗജാംതകാംധകാംതകം തമംതകാംതകം ഭജേ || 10 ||

ജയത്വദഭ്രവിഭ്രമഭ്രമദ്ഭുജംഗമശ്വസ-
-ദ്വിനിര്ഗമത്ക്രമസ്ഫുരത്കരാലഫാലഹവ്യവാട് |
ധിമിദ്ധിമിദ്ധിമിധ്വനന്മൃദംഗതുംഗമംഗള
ധ്വനിക്രമപ്രവര്തിത പ്രചംഡതാംഡവഃ ശിവഃ || 11 ||

ദൃഷദ്വിചിത്രതല്പയോര്ഭുജംഗമൗക്തികസ്രജോര്-
-ഗരിഷ്ഠരത്നലോഷ്ഠയോഃ സുഹൃദ്വിപക്ഷപക്ഷയോഃ |
തൃഷ്ണാരവിംദചക്ഷുഷോഃ പ്രജാമഹീമഹേംദ്രയോഃ
സമം പ്രവര്തയന്മനഃ കദാ സദാശിവം ഭജേ || 12 ||

കദാ നിലിംപനിര്ഝരീനികുംജകോടരേ വസന്
വിമുക്തദുര്മതിഃ സദാ ശിരഃസ്ഥമംജലിം വഹന് |
വിമുക്തലോലലോചനോ ലലാടഫാലലഗ്നകഃ
ശിവേതി മംത്രമുച്ചരന് സദാ സുഖീ ഭവാമ്യഹമ് || 13 ||

ഇമം ഹി നിത്യമേവമുക്തമുത്തമോത്തമം സ്തവം
പഠന്സ്മരന്ബ്രുവന്നരോ വിശുദ്ധിമേതിസംതതമ് |
ഹരേ ഗുരൗ സുഭക്തിമാശു യാതി നാന്യഥാ ഗതിം
വിമോഹനം ഹി ദേഹിനാം സുശംകരസ്യ ചിംതനമ് || 14 ||

പൂജാവസാനസമയേ ദശവക്ത്രഗീതം യഃ
ശംഭുപൂജനപരം പഠതി പ്രദോഷേ |
തസ്യ സ്ഥിരാം രഥഗജേംദ്രതുരംഗയുക്താം
ലക്ഷ്മീം സദൈവ സുമുഖിം പ്രദദാതി ശംഭുഃ || 15 ||




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